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मिट्टी के प्रकार एवं वितरण

 इस पेज में हम मिट्टी के प्रकार एवं वितरण से आपको परिचित कराने वाले हैं। साथ ही साथ हम आपको मृदा के विशेषताओं को भी बताने वाले हैं।


    मिट्टी के प्रकार एवं वितरण

    भारत में मृदा के प्रकार एवं वितरण

    भारत में मुख्यता 6 प्रकार की मिट्टी पाई जाती है :-

    • जलोढ़ मृदा 
    • काली मिट्टी 
    • लाल एवं पीली मिट्टी 
    • लेटराइट मिट्टी 
    • मरुस्थलीय मिट्टी 
    • पर्वतीय मिट्टी

    जलोढ़ मिट्टी 

    यह मिट्टी भारत में विस्तृत रूप से फैली हुई एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण मिट्टी है। जलोढ़ मृदा का गठन बालू , सिल्ट एवं मृतिका के विभिन्न अनुपात में होने से हुआ है। इस मिट्टी में पोटाश , फास्फोरस और चुना की प्रधानता जबकि इसमें नाइट्रोजन एवं जैव पदार्थों की कमी होती है। इस मिट्टी में गहन कृषि की जाती है । 

    इसमें गन्ना, चावल , गेहूं,  मक्का एवं दलहन फसलों की खेती की जाती है । इस मिट्टी का रंग धुंधला से भूरे रंग का होता है। यह मिट्टी उत्तर भारत, पूर्वी तटीय मैदान में पाई जाती है । यह मिट्टी मुख्य रूप से बिहार, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा में पाई जाती है । यह मिट्टी भारत में 6.4 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर पाई जाती है। 

    जलोढ़ मृदा के प्रकार

    आयु के आधार पर जलोढ़ मृदा को दो भागों में बांटा गया है :- 

    खादर और बांगर

     खादर : नई जलोढ़ मृदा को खादर कहा जाता है । इसमें बालू एवं मृतिका की महीन कणों का मिश्रण होता है। यह काफी उपजाऊ होता है । 

    बांगर : पुरानी जलोढ़ मृदा को बांगर कहा जाता है । जिसमें कंकर और बजरी की अधिकता होती है।

    काली मृदा

    यह मिट्टी भारत में विस्तृत रूप से फैली होती है । इस मृदा में एलुमिनियम एवं लौह योगिक की उपस्थिति के कारण इसका रंग काला होता है। इसमें जल धारण क्षमता अत्यधिक होती हैै। इसमें कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम , पोटाश और चूना की अधिकता परंतु फास्फोरस की कमी होती है। 

    इस मिट्टी का निर्माण मूल सैलो एवं ज्वालामुखी के बेसाल्ट लावा के विघटन से हुआ है।

     इस मिट्टी को रेगुर मृदा भी कहा जाता है । इसके अतिरिक्त इसे काली कपासी मृदा भी कहा जाता है।

     इसमें मुख्य रूप से कपास, गन्ना , प्याज , गेहूं एवं फलों की खेती की जाती है। यह मृदा दक्कन के अलावा प्रदेश, महाराष्ट्र गुजरात , कर्नाटक , आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में पाई जाती है । इसका विस्तार भारत में 6.4 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर है।

    लाल एवं पीली मिट्टी

    इस मिट्टी में यह लौह अंश की उपस्थिति के कारण इसका रंग लाल और जलयोजन के पश्चात इसका रंग पीला होता है । जैव पदार्थों की कमी के कारण यह मिट्टी अपेक्षाकृत कम उपजाऊ होती है। 

    इस मिट्टी का निर्माण ग्रेनाइट , नीस जैसे से रवेदार  आग्नेय चट्टानों के विघटित एवं रूपांतरित होने से हुआ है। इसमें मुख्य रूप से चावल , ज्वार , बाजरा मक्का , मूंगफली , तंबाकू और फलों का उत्पादन किया जाता है । 

    यह मिट्टी तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा , दक्षिण पूर्वी महाराष्ट्र , आंध्रप्रदेश, उड़ीसा , छोटा नागपुर पठार और मेघालय पठार में पाई जाती है। इसका विस्तार भारत के कुल कृषि भूमि के 7.2 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर है।

    लैटराइट मिट्टी

     लैटराइट शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के लेटर शब्द से हुई है जिसका अर्थ ईट होता है । यह मिट्टी के तीव्र  निक्षालन की प्रक्रिया से बनती है। इसमें ह्यूमस की मात्रा नगण्य होती है। एलुमिनियम और लौह ऑक्साइड की उपस्थिति के कारण इस कारण लाल होता है। 

    अपक्षय के कारण यह मिट्टी कठोर हो जाती है । इस प्रकार की मिट्टी का निर्माण उच्च तापमान एवं अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में हुआ है । ऋतुवत वर्षा से ऊंचे सपाट अपठित सतहों पर यह मिट्टी पाई जाती है । इस मिट्टी में रासायनिक खाद एवं अन्य उर्वरकों का प्रयोग कर चाय कहवा काजू इत्यादि की खेती की जाती है ।

     भारत में इस प्रकार की मृदा का विस्तार लगभग 1.3 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर है। इस प्रकार की मिट्टी का विस्तार कर्नाटक, केरल , तमिलनाडु मध्य प्रदेश और उड़ीसा तथा असम की पहाड़ियों पर है । कर्नाटक , केरल और तमिलनाडु में चाय एवं कहवा की खेती की जाती है । आंध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु में काजू की खेती की जाती है।

    मरुस्थलीय मृदा

    मरुस्थलीय मृदा का विकास लंबी शुष्क ऋतु , अल्प वर्षा , ह्यूमस रहित बालुई मिट्टी वाले क्षेत्रों में होता है । इसमें रासायनिक अपक्षय अत्यंत सीमित होता है। 

     इस मिट्टी का रंग लाल या हल्का बुरा होता है । इस प्रकार की मिट्टी पश्चिमी राजस्थान, सौराष्ट्र , कच्छ पश्चिमी हरियाणा और दक्षिणी पंजाब में पाया जाता है । इस मिट्टी में सिंचाई की व्यवस्था कर कपास , चावल , गेहूं का भी उत्पादन किया जा सकता है।

    पर्वतीय मिट्टी 

    यह मिट्टी जटिल एवं विविधता वाली होती है । पहाड़ी क्षेत्रों में यह भू आकृतिक वानस्पतिक और जल भाविक दशाओं में पर्याप्त जटिलता एवं विविधता के कारण एक ही प्रकार के बड़े-बड़े क्षेत्र मिलते हैं । 

    यह मिट्टी अम्लीय एवं ह्यूमस रहित होते हैं । इस प्रकार की मिट्टी प्रायः पर्वतीय और पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती हैं । इसके पर्वतीय ढलानों पर फलों के बागानों और नदी घाटियों में चावल एवं आलू जैसी फसलों का उत्पादन किया जाता है।